श्रील प्रभुपाद जी की संपूर्ण जीवन-लीला | अभय चरण से विश्वगुरु तक की अद्भुत यात्रा | A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada
श्रील प्रभुपाद जी की संपूर्ण जीवन-लीला
अभय चरण से विश्वगुरु तक की अद्भुत यात्रा
प्रस्तावना
भारत की आध्यात्मिक भूमि ने अनेक संतों, आचार्यों और भक्तों को जन्म दिया है। इन्हीं महान संतों में एक ऐसा नाम है जिसने भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति का संदेश भारत की सीमाओं से बाहर ले जाकर संसार के अनेक देशों तक पहुँचाया—His Divine Grace A.C. भक्तिवेदांत स्वामी श्रील प्रभुपाद।
ISKCON उन्हें अपने Founder-Acharya के रूप में मानता है। उनका जन्म 1 सितंबर 1896 को कलकत्ता में अभय चरण डे के रूप में हुआ था।
जिस समय भारत अंग्रेजी शासन के अधीन था, उस समय एक सामान्य भारतीय परिवार में जन्म लेने वाला यह बालक आगे चलकर अमेरिका और यूरोप सहित संसार के अनेक देशों में कृष्ण-भक्ति का प्रचार करेगा—यह उस समय किसी ने नहीं सोचा था।
उनका जीवन केवल एक संत की जीवनी नहीं है। यह गुरु-आज्ञा, दृढ़ विश्वास, संघर्ष, त्याग, साधना और भगवान श्रीकृष्ण के प्रति समर्पण की कथा है।
अध्याय 1
कलकत्ता की पावन धरती पर जन्म
1 सितंबर 1896।
कलकत्ता में एक वैष्णव परिवार के घर एक बालक का जन्म हुआ। उसका नाम रखा गया—अभय चरण डे।
उनके परिवार में भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति का वातावरण था। बचपन से ही अभय का मन कृष्ण-भक्ति की ओर आकर्षित था। उपलब्ध जीवनी-स्रोतों के अनुसार बचपन से ही वे भगवान कृष्ण की पूजा करते थे और कृष्ण को परम भगवान मानते थे।
उनके पिता गौर मोहन डे कृष्ण के भक्त थे। पिता की इच्छा थी कि उनका पुत्र भी भगवान कृष्ण का भक्त बने।
कहा जाता है कि बालक अभय के लिए भगवान कृष्ण केवल पूजा की मूर्ति नहीं थे। उनके जीवन में कृष्ण बचपन से ही एक जीवंत आध्यात्मिक उपस्थिति थे।
यही बाल संस्कार आगे चलकर उनके पूरे जीवन की नींव बने।
अध्याय 2
बचपन में ही रथयात्रा की इच्छा
अभय चरण के बचपन में ही भक्ति के संस्कार दिखाई देने लगे थे।
कलकत्ता में जगन्नाथ रथयात्रा का बड़ा उत्सव होता था। बालक अभय भी चाहते थे कि भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा हो।
उनके मन में यह भावना थी कि भगवान का नाम, भगवान का उत्सव और भगवान की सेवा केवल मंदिर तक सीमित नहीं होनी चाहिए।
बाद के वर्षों में जब वे अमेरिका पहुँचे, तो उन्होंने वहाँ भी रथयात्रा उत्सव आयोजित करवाया।
इस प्रकार बचपन में जिस बालक के मन में भगवान जगन्नाथ के रथ की भावना थी, वही भावना वर्षों बाद दुनिया के अनेक शहरों में दिखाई देने लगी।
अध्याय 3
शिक्षा और युवावस्था
अभय चरण ने आधुनिक शिक्षा प्राप्त की। वे बुद्धिमान और अध्ययनशील युवक थे।
युवावस्था में भारत राजनीतिक रूप से भी बड़े परिवर्तन के दौर से गुजर रहा था। देश अंग्रेजी शासन के अधीन था और स्वतंत्रता आंदोलन तेजी से आगे बढ़ रहा था।
अभय भी उस समय के राष्ट्रीय वातावरण से प्रभावित हुए। वे महात्मा गांधी के स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े थे। ISKCON के आधिकारिक जीवन-वृत्तांत में भी उनके युवा जीवन में गांधी के सविनय अवज्ञा आंदोलन से जुड़ने का उल्लेख मिलता है। �
ISKCON
लेकिन उनके जीवन में एक ऐसी मुलाकात होने वाली थी जिसने उनकी दिशा बदल दी।
अध्याय 4
1922—वह ऐतिहासिक मुलाकात
सन् 1922।
अभय चरण की मुलाकात एक महान वैष्णव आचार्य से हुई—श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर।
यह मुलाकात उनके जीवन का निर्णायक मोड़ बन गई।
भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर उस समय गौड़ीय वैष्णव परंपरा के प्रमुख आचार्यों में से थे।
अभय उस समय युवा, शिक्षित और अपने जीवन में व्यस्त थे। लेकिन जब उन्होंने भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर को सुना, तो उनके भीतर कुछ बदलने लगा।
भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर ने उनसे कहा कि भगवान श्रीचैतन्य महाप्रभु और श्रीकृष्ण की शिक्षाओं को अंग्रेजी भाषा के माध्यम से पश्चिमी देशों में प्रचारित किया जाना चाहिए।
अभय ने उस समय तर्क किया कि भारत स्वयं अंग्रेजी शासन के अधीन है—ऐसे में पश्चिम के लोग भारत की आध्यात्मिक शिक्षा क्यों सुनेंगे?
लेकिन भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर ने अपने तर्कों से उन्हें प्रभावित किया।
बाद में श्रील प्रभुपाद ने स्वयं बताया कि उस मुलाकात ने उनके जीवन को बदल दिया था।
अध्याय 5
गुरु की आज्ञा
यहाँ से एक ऐसी यात्रा शुरू हुई जो लगभग चार दशक बाद जाकर अपने अद्भुत परिणाम तक पहुँची।
श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर की इच्छा थी कि कृष्ण-भक्ति का संदेश अंग्रेजी भाषा में पश्चिमी देशों तक पहुँचे।
अभय चरण ने उस समय तुरंत अमेरिका जाने का निर्णय नहीं लिया।
वे गृहस्थ जीवन में थे। उनका विवाह हो चुका था और परिवार की जिम्मेदारियाँ भी थीं। उपलब्ध स्रोतों के अनुसार उनका विवाह 1918 में हुआ था और 1921 में उनके पहले पुत्र का जन्म हुआ।
लेकिन गुरु की वह आज्ञा उनके हृदय में बैठ गई।
1922 में मिली गुरु की आज्ञा उनके जीवन की दिशा बन गई।
अध्याय 6
1933—दीक्षा
समय बीतता गया।
अभय चरण भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर के संपर्क में अधिक निकटता से आते गए।
सन् 1933 में उन्होंने औपचारिक रूप से भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर से दीक्षा ग्रहण की।
अब उनका आध्यात्मिक जीवन और अधिक व्यवस्थित रूप से आगे बढ़ा।
गुरु की सेवा, वैष्णव साहित्य का अध्ययन और कृष्ण-भक्ति का प्रचार उनके जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बनता गया।
लेकिन गुरु की सबसे बड़ी आज्ञा अभी पूरी नहीं हुई थी।
वह आज्ञा थी—
भगवान श्रीकृष्ण और श्रीचैतन्य महाप्रभु के संदेश को अंग्रेजी बोलने वाले संसार तक पहुँचाना।
अध्याय 7
गुरु का अंतिम संदेश
1936 में भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर का देहावसान हुआ।
लेकिन अपने गुरु के शरीर छोड़ने के बाद भी अभय चरण के लिए गुरु की आज्ञा समाप्त नहीं हुई।
वह आज्ञा उनके जीवन का संकल्प बन गई।
श्रील प्रभुपाद ने बाद में बताया कि उनके गुरु ने उन्हें अंग्रेजी में प्रचार करने के लिए प्रेरित किया था।
लेकिन अब उनके सामने प्रश्न था—
“कैसे?”
उनके पास कोई बड़ा संगठन नहीं था।
न कोई विशाल धन-संपत्ति।
न कोई अंतरराष्ट्रीय संस्था।
न पश्चिम में कोई मजबूत संपर्क।
फिर भी उनके पास एक चीज थी—
गुरु की आज्ञा में विश्वास।
अध्याय 8
गृहस्थ जीवन से वैराग्य की ओर
श्रील प्रभुपाद का जीवन धीरे-धीरे सांसारिक जिम्मेदारियों से आध्यात्मिक मिशन की ओर बढ़ने लगा।
उन्होंने व्यवसाय किया, परिवार की जिम्मेदारियाँ निभाईं और साथ-साथ कृष्ण-भक्ति के प्रचार का प्रयास जारी रखा।
सन् 1954 में उन्होंने गृहस्थ जीवन से अलग होकर वानप्रस्थ आश्रम स्वीकार किया। श्रील प्रभुपाद के अपने वक्तव्यों में इसका उल्लेख मिलता है।
अब उनका जीवन पहले से अधिक स्वतंत्र था।
उनका लक्ष्य स्पष्ट था—
अपने गुरु की इच्छा को पूरा करना।
अध्याय 9
वृंदावन की ओर
वैराग्य जीवन के बाद श्रील प्रभुपाद वृंदावन में रहने लगे।
वृंदावन केवल उनके लिए एक स्थान नहीं था।
यह भगवान श्रीकृष्ण की लीलाभूमि थी।
वे वहाँ राधा-दामोदर मंदिर में रहते और लिखने का कार्य करते थे।
यहीं उन्होंने श्रीमद्भागवत के अंग्रेजी अनुवाद और टीका के कार्य को आगे बढ़ाया। उनके अपने वक्तव्यों में वृंदावन में बैठकर भागवत लिखने और उसे दिल्ली में प्रकाशित करवाने का वर्णन मिलता है।
वह समय अत्यंत कठिन था।
लेकिन उनके पास एक छोटा-सा कमरा, लेखन सामग्री और श्रीकृष्ण का नाम था।
अध्याय 10
Back to Godhead—एक छोटी शुरुआत
सन् 1944 में उन्होंने अंग्रेजी पत्रिका Back to Godhead प्रारंभ की।
यह कार्य भी उन्होंने लगभग अकेले किया।
वे लेख लिखते।
उन्हें संपादित करते।
टाइप करते।
प्रूफ देखते।
प्रिंट करवाते।
और फिर स्वयं लोगों को प्रतियाँ देते।
यह केवल एक पत्रिका नहीं थी।
यह उनके गुरु की आज्ञा को पूरा करने की दिशा में एक कदम था।
अध्याय 11
श्रीमद्भागवत का महान कार्य
अब उनका ध्यान श्रीमद्भागवत के अंग्रेजी अनुवाद और व्याख्या की ओर अधिक केंद्रित हो गया।
वे चाहते थे कि पश्चिमी देशों के लोग भी भारत के वैदिक साहित्य को समझ सकें।
उन्होंने श्रीमद्भागवत के अनेक भागों पर कार्य किया और उन्हें प्रकाशित करवाया।
1965 में अमेरिका जाने से पहले उन्होंने श्रीमद्भागवत के तीन खंड प्रकाशित किए थे।
उनके पास साधन बहुत कम थे।
लेकिन उनका विश्वास बहुत बड़ा था।
अध्याय 12
अमेरिका जाने का निर्णय
अब वह समय आ गया था जिसका संकेत उनके गुरु ने दशकों पहले दिया था।
श्रील प्रभुपाद की आयु लगभग 69 वर्ष थी।
इतनी उम्र में सामान्य व्यक्ति आराम और सुरक्षा चाहता है।
लेकिन श्रील प्रभुपाद ने इसके विपरीत निर्णय लिया।
उन्होंने अमेरिका जाने का निश्चय किया।
उनके पास न कोई बड़ा दल था और न कोई आर्थिक सुरक्षा।
वे एक जहाज से भारत से अमेरिका के लिए रवाना हुए।
जहाज का नाम था—
🚢 जलदूत
1965 में उन्होंने Jaladuta से भारत छोड़ा और अमेरिका की ओर यात्रा शुरू की।
उनके साथ श्रीमद्भागवत की पुस्तकें थीं।
एक वैष्णव संन्यासी, एक टाइपराइटर, कुछ सामान और भगवान श्रीकृष्ण पर अटूट विश्वास।
अध्याय 13
समुद्र की यात्रा
जलदूत पर यात्रा आसान नहीं थी।
इतनी अधिक आयु में समुद्री यात्रा करना अपने आप में कठिन था।
श्रील प्रभुपाद ने अपनी यात्रा के दौरान भगवान श्रीकृष्ण से प्रार्थना की।
उनकी यात्रा का उद्देश्य धन कमाना या प्रसिद्धि प्राप्त करना नहीं था।
वे कृष्ण का संदेश लेकर जा रहे थे।
उन्होंने अपने गुरु की आज्ञा को हृदय में रखा था।
अध्याय 14
अमेरिका की धरती पर पहला कदम
सितंबर 1965 में श्रील प्रभुपाद अमेरिका पहुँचे।
वे न्यूयॉर्क पहुँचे, लेकिन वहाँ उनका स्वागत करने के लिए कोई बड़ा संगठन नहीं था।
न कोई बड़ा आश्रम।
न कोई अनुयायियों की भीड़।
न कोई धन-संपत्ति।
ISKCON के इतिहास के अनुसार उन्होंने अमेरिका पहुँचने के बाद लगभग पहला वर्ष बहुत संघर्ष में बिताया।
वे अकेले थे।
लेकिन उनके भीतर एक विश्वास था—
“कृष्ण मुझे यहाँ लेकर आए हैं।”
अध्याय 15
न्यूयॉर्क में संघर्ष
न्यूयॉर्क की भीड़ में एक वृद्ध भारतीय संन्यासी।
हाथ में कृष्ण की पुस्तकें।
साधन बहुत सीमित।
लेकिन हृदय में विशाल मिशन।
वे लोगों से मिलते।
कृष्ण के बारे में बताते।
भगवद्गीता और श्रीमद्भागवत की बातें करते।
कीर्तन करते।
धीरे-धीरे कुछ युवा उनके पास आने लगे।
उनमें से कई युवा आधुनिक जीवन से संतुष्ट नहीं थे और आध्यात्मिक मार्ग की तलाश में थे।
श्रील प्रभुपाद ने उन्हें सरल साधना दी—
हरे कृष्ण महामंत्र का कीर्तन।
अध्याय 16
हरे कृष्ण महामंत्र
वे युवाओं को भगवान के नाम का जाप सिखाते।
हरे कृष्ण हरे कृष्ण
कृष्ण कृष्ण हरे हरे
हरे राम हरे राम
राम राम हरे हरे
उनके लिए यह केवल मंत्र का उच्चारण नहीं था।
यह भगवान के नाम का स्मरण था।
वे लोगों को बताते कि मनुष्य अपने जीवन को भगवान की भक्ति से आध्यात्मिक दिशा दे सकता है।
धीरे-धीरे कीर्तन में लोगों की संख्या बढ़ने लगी।
अध्याय 17
टॉमपकिन्स स्क्वायर पार्क
न्यूयॉर्क के Tompkins Square Park में श्रील प्रभुपाद ने सार्वजनिक कीर्तन किया।
एक वृद्ध भारतीय संन्यासी और उनके आसपास युवा अमेरिकी।
मृदंग बज रहा था।
करताल बज रहे थे।
और गूंज रहा था—
“हरे कृष्ण! हरे कृष्ण!”
यह दृश्य उस समय न्यूयॉर्क के लिए असामान्य था।
लेकिन यही छोटा-सा कीर्तन आगे चलकर एक अंतरराष्ट्रीय आंदोलन के विस्तार का हिस्सा बना।
अध्याय 18
1966—ISKCON की स्थापना
सन् 1966 में श्रील प्रभुपाद ने न्यूयॉर्क में International Society for Krishna Consciousness (ISKCON) की स्थापना की।
यह घटना उनके मिशन का महत्वपूर्ण मोड़ थी।
ISKCON के आधिकारिक इतिहास के अनुसार जुलाई 1966 में उन्होंने न्यूयॉर्क के Lower East Side में एक छोटे storefront से काम करते हुए संस्था की स्थापना की।
अब कृष्ण-भक्ति का प्रचार एक संगठित रूप लेने लगा।
उनके शिष्य बनने लगे।
कीर्तन होने लगे।
प्रसाद वितरण होने लगा।
भगवद्गीता और अन्य वैष्णव ग्रंथों का अध्ययन होने लगा।
अध्याय 19
एक छोटी दुकान से विश्वव्यापी आंदोलन तक
शुरुआत एक छोटे से स्थान से हुई थी।
लेकिन श्रील प्रभुपाद की दृष्टि बहुत बड़ी थी।
वे चाहते थे कि—
भगवान कृष्ण का नाम संसार में पहुँचे।
भगवद्गीता का अध्ययन हो।
श्रीमद्भागवत का प्रचार हो।
लोग शाकाहारी प्रसाद ग्रहण करें।
नियमित हरिनाम-संकीर्तन हो।
मंदिर स्थापित हों।
लोग कृष्ण-भक्ति का अभ्यास करें।
धीरे-धीरे उनके शिष्य अमेरिका के अलग-अलग शहरों में जाने लगे।
फिर यूरोप।
फिर कनाडा।
फिर ऑस्ट्रेलिया।
और दुनिया के अन्य भाग।
अध्याय 20
पुस्तकें—प्रभुपाद का दूसरा महान अभियान
श्रील प्रभुपाद के मिशन में पुस्तकों का विशेष स्थान था।
उन्होंने केवल प्रवचन नहीं किए।
उन्होंने विशाल मात्रा में वैष्णव साहित्य उपलब्ध कराया।
उनकी प्रमुख पुस्तकों में शामिल हैं—
भगवद्गीता यथारूप
श्रीमद्भागवतम्
श्री चैतन्य चरितामृत
ईशोपनिषद
भक्ति-रसामृत-सिन्धु पर आधारित Nectar of Devotion
और अन्य ग्रंथ।
उनका उद्देश्य था कि लोग केवल किसी व्यक्ति की बात सुनकर न रुकें, बल्कि मूल वैदिक ग्रंथों का अध्ययन करें।
अध्याय 21
गुरु की आज्ञा का विस्तार
जब वे 1965 में अमेरिका पहुँचे थे, तब बहुत कम लोग उन्हें जानते थे।
लेकिन कुछ ही वर्षों में उनकी संस्था कई देशों तक फैल गई।
ISKCON के आधिकारिक इतिहास के अनुसार 1966 में संस्था की स्थापना के बाद उसके केंद्र क्रमशः बढ़ते गए। �
ISKCON
श्रील प्रभुपाद स्वयं लगातार यात्रा करते रहे।
वे एक देश से दूसरे देश जाते।
प्रवचन देते।
कीर्तन करते।
शिष्यों को प्रशिक्षण देते।
मंदिरों की व्यवस्था देखते।
पुस्तकों के प्रकाशन पर ध्यान देते।
और सबसे महत्वपूर्ण—
भगवान श्रीकृष्ण के नाम का प्रचार करते।
अध्याय 22
भारत में वापसी
जब पश्चिमी देशों में उनके शिष्य बनने लगे, तब श्रील प्रभुपाद भारत लौटे।
अब स्थिति बदल चुकी थी।
जो व्यक्ति भारत से अकेला अमेरिका गया था, वह अब अनेक विदेशी शिष्यों के साथ भारत आया।
भारत में लोगों ने देखा कि पश्चिमी देशों के युवक-युवतियाँ भगवा वस्त्र पहनकर, माला लेकर और हरे कृष्ण महामंत्र का कीर्तन करते हुए भारतीय वैष्णव परंपरा का अभ्यास कर रहे हैं।
अध्याय 23
मायापुर और वृंदावन
श्रील प्रभुपाद ने भारत में भी बड़े आध्यात्मिक केंद्रों की स्थापना की दिशा में कार्य किया।
श्रीधाम मायापुर,
वृंदावन,
और मुंबई जैसे स्थान उनके मिशन के प्रमुख केंद्र बने।
वृंदावन उनके हृदय के अत्यंत प्रिय स्थानों में था।
वहाँ उन्होंने कृष्ण-भक्ति के प्रचार और भक्तों के लिए एक स्थायी केंद्र की दिशा में कार्य किया।
अध्याय 24
विश्वभर में मंदिर
श्रील प्रभुपाद के जीवनकाल में अनेक देशों में ISKCON के मंदिर और केंद्र स्थापित हुए।
उनका उद्देश्य केवल मंदिर बनाना नहीं था।
वे चाहते थे कि मंदिर—
भक्ति, शिक्षा, प्रसाद, कीर्तन और आध्यात्मिक जीवन के केंद्र बनें।
उनकी संस्था के विस्तार का उल्लेख ISKCON और उसके Governing Body Commission के आधिकारिक जीवनी स्रोतों में मिलता है।
अध्याय 25
रथयात्रा का विश्वव्यापी स्वरूप
बचपन में भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा से प्रभावित अभय चरण ने बाद में पश्चिमी देशों में भी जगन्नाथ रथयात्रा के आयोजन को प्रोत्साहित किया।
आज दुनिया के कई शहरों में जगन्नाथ रथयात्रा और हरे कृष्ण कीर्तन आयोजित होते हैं।
यह उनके जीवन की एक सुंदर कड़ी है—
कलकत्ता का बालक अभय → भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा → अमेरिका में रथयात्रा → विश्वभर में कृष्ण-भक्ति का प्रचार।
अध्याय 26
श्रील प्रभुपाद की मुख्य शिक्षाएँ
श्रील प्रभुपाद ने अपने शिष्यों और समाज को अनेक आध्यात्मिक सिद्धांतों का पालन करने के लिए प्रेरित किया।
उनकी शिक्षा का केंद्र था—
1. भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण
मनुष्य को अपने जीवन का केंद्र भगवान की भक्ति को बनाना चाहिए।
2. हरे कृष्ण महामंत्र का जाप
नियमित रूप से भगवान के नाम का जाप और कीर्तन करना।
3. भगवद्गीता का अध्ययन
भगवद्गीता को समझना और उसके अनुसार जीवन जीने का प्रयास करना।
4. श्रीमद्भागवत का अध्ययन
भक्ति और भगवान के स्वरूप को समझने के लिए भागवत का अध्ययन करना।
5. प्रसाद
भोजन को भगवान को अर्पित करके प्रसाद के रूप में ग्रहण करना।
6. साधु-संग
भक्तों और आध्यात्मिक साधकों का संग करना।
7. गुरु-परंपरा
आध्यात्मिक ज्ञान को गुरु-शिष्य परंपरा से ग्रहण करना।
अध्याय 27
चार नियामक सिद्धांत
ISKCON की साधना-परंपरा में श्रील प्रभुपाद ने अपने शिष्यों के लिए कुछ अनुशासन निर्धारित किए।
इनमें प्रमुख रूप से—
मांसाहार से बचना
नशे से बचना
जुआ खेलने से बचना
अवैध यौन संबंधों से बचना
शामिल हैं।
इनका उद्देश्य भक्त के जीवन में संयम और आध्यात्मिक साधना को मजबूत करना था।
अध्याय 28
वृद्धावस्था में भी अथक यात्रा
श्रील प्रभुपाद की आयु बढ़ रही थी।
लेकिन उनका कार्य रुक नहीं रहा था।
जिस उम्र में अधिकांश लोग विश्राम चाहते हैं, उस उम्र में वे दुनिया की यात्रा कर रहे थे।
उनकी दिनचर्या में लेखन, अनुवाद, प्रवचन, भक्तों से मिलना, मंदिरों की व्यवस्था और पुस्तक प्रकाशन जैसे अनेक कार्य शामिल रहते थे।
एक स्रोत में उनके अमेरिका के शुरुआती दिनों का वर्णन करते हुए बताया गया है कि वे लंबे समय तक लेखन और श्रीमद्भागवत के कार्य में लगे रहते थे।
अध्याय 29
गुरु की आज्ञा की पूर्णता
यदि 1922 को शुरुआत माना जाए, तो 1965 तक लगभग 43 वर्ष बीत चुके थे।
इन वर्षों में अभय चरण ने अनेक उतार-चढ़ाव देखे।
लेकिन गुरु की आज्ञा उनके भीतर बनी रही।
फिर 1965 में वे अमेरिका गए।
1966 में ISKCON की स्थापना हुई।
और अगले वर्षों में कृष्ण-भक्ति का प्रचार अनेक देशों में फैल गया।
इसलिए उनके जीवन को समझने के लिए एक बात विशेष रूप से महत्वपूर्ण है—
उन्होंने अपने मिशन को एक दिन में नहीं बनाया।
यह दशकों की तैयारी, साधना, लेखन, संघर्ष और गुरु-सेवा का परिणाम था।
अध्याय 30
अंतिम वर्षों की ओर
1970 के दशक में भी श्रील प्रभुपाद लगातार सक्रिय रहे।
उन्होंने अपने शिष्यों को संस्थागत जिम्मेदारियाँ सौंपने की व्यवस्था विकसित की।
ISKCON के इतिहास में Governing Body Commission (GBC) की स्थापना भी उनके संगठनात्मक कार्य का महत्वपूर्ण हिस्सा रही।
उनकी इच्छा थी कि उनके बाद भी संस्था व्यवस्थित रूप से आगे बढ़े।
अध्याय 31
अंतिम समय—वृंदावन
1977 में श्रील प्रभुपाद का स्वास्थ्य कमजोर हुआ।
उन्होंने अपने जीवन के अंतिम समय में वृंदावन में रहना पसंद किया।
वही वृंदावन—
जहाँ उन्होंने वर्षों पहले बैठकर श्रीमद्भागवत पर कार्य किया था।
वही वृंदावन—
जहाँ से उन्होंने अपने गुरु की आज्ञा को पूरा करने का संकल्प मजबूत किया था।
और अब जीवन की अंतिम यात्रा भी उसी धाम में पूरी होने वाली थी।
अध्याय 32
14 नवंबर 1977
14 नवंबर 1977 को वृंदावन में श्रील प्रभुपाद ने इस संसार की अपनी लीला समाप्त की।
ISKCON के आधिकारिक जीवनी स्रोत भी उनकी मृत्यु की तिथि 14 नवंबर 1977 बताते हैं।
वे 81 वर्ष के थे।
उनका शरीर संसार में नहीं रहा, लेकिन उनकी पुस्तकें, शिक्षाएँ, मंदिर, शिष्य और उनके द्वारा स्थापित संस्था आगे बढ़ती रही।
अध्याय 33
श्रील प्रभुपाद की सबसे बड़ी विरासत
श्रील प्रभुपाद की विरासत को केवल मंदिरों की संख्या से नहीं समझा जा सकता।
उनकी सबसे महत्वपूर्ण विरासत है—
भगवान श्रीकृष्ण के नाम का वैश्विक प्रचार।
उन्होंने संस्कृत और बंगाली वैष्णव साहित्य को अंग्रेजी सहित अनेक भाषाओं में उपलब्ध कराया।
उन्होंने भगवद्गीता और श्रीमद्भागवत को पश्चिमी पाठकों तक पहुँचाया।
उन्होंने हरिनाम-संकीर्तन को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रस्तुत किया।
उन्होंने भक्तों को साधना और सेवा का जीवन दिया।
और उन्होंने एक ऐसी संस्था स्थापित की जो उनके शरीर छोड़ने के बाद भी आगे बढ़ती रही।
अध्याय 34
एक अकेले संन्यासी से विश्वव्यापी आंदोलन तक
कल्पना कीजिए—
एक वृद्ध संन्यासी।
भारत से अकेले निकलता है।
न कोई बड़ा धन।
न कोई राजनीतिक शक्ति।
न कोई विशाल संगठन।
साथ में केवल भगवान श्रीकृष्ण के प्रति विश्वास और गुरु की आज्ञा।
अमेरिका पहुँचता है।
संघर्ष करता है।
कीर्तन करता है।
कुछ लोग जुड़ते हैं।
एक छोटा केंद्र बनता है।
फिर दूसरा।
फिर तीसरा।
और धीरे-धीरे यह संदेश दुनिया के अनेक देशों तक पहुँचता है।
यही श्रील प्रभुपाद की जीवन-यात्रा की सबसे महत्वपूर्ण तस्वीर है।
श्रील प्रभुपाद के जीवन से मिलने वाली प्रेरणा
उनका जीवन हमें कई बातें सिखाता है।
1. उम्र लक्ष्य के रास्ते में अंतिम बाधा नहीं है
उन्होंने लगभग 69 वर्ष की आयु में अमेरिका की यात्रा की।
आज भी यह उनके जीवन की सबसे उल्लेखनीय घटनाओं में गिनी जाती है।
2. गुरु की आज्ञा को जीवन का लक्ष्य बनाया जा सकता है
1922 में मिली प्रेरणा को उन्होंने दशकों बाद भी नहीं छोड़ा।
3. साधन कम हों तो भी प्रयास बंद नहीं करना चाहिए
उनके पास शुरुआत में सीमित साधन थे, लेकिन उन्होंने लेखन और प्रचार जारी रखा।
4. पुस्तकों की शक्ति
उन्होंने अपने संदेश को पुस्तकों के माध्यम से स्थायी रूप दिया।
5. नाम-संकीर्तन
हरे कृष्ण महामंत्र को उन्होंने सार्वजनिक कीर्तन के माध्यम से संसार के सामने रखा।
6. सेवा
उनके लिए भक्ति केवल व्यक्तिगत साधना नहीं थी; वे कृष्ण-भक्ति के संदेश को दूसरों तक पहुँचाने को भी सेवा मानते थे।
अंतिम संदेश
श्रील प्रभुपाद का जीवन एक लंबी आध्यात्मिक यात्रा की तरह दिखाई देता है।
1896 — अभय चरण का जन्म।
फिर बचपन में कृष्ण-भक्ति।
युवावस्था में शिक्षा और गृहस्थ जीवन।
1922 — भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर से मुलाकात।
1933 — दीक्षा।
1944 — Back to Godhead का प्रारंभ।
वानप्रस्थ जीवन।
वृंदावन में श्रीमद्भागवत का लेखन।
1965 — जलदूत से अमेरिका की यात्रा।
1966 — ISKCON की स्थापना।
फिर संसार के अनेक देशों में कृष्ण-भक्ति का प्रचार।
और अंततः—
14 नवंबर 1977 — वृंदावन में उनकी अंतिम लीला।
लेकिन उनके अनुयायियों के लिए उनकी शिक्षाएँ और उनका साहित्य आज भी जीवित हैं।
उनके जीवन की पूरी कथा को एक वाक्य में कहा जाए तो वह यह होगी—
“गुरु की आज्ञा को हृदय में धारण करके, श्रीकृष्ण के नाम और संदेश को संसार तक पहुँचाने का आजीवन प्रयास।”
और इसी कारण श्रील प्रभुपाद की जीवन-गाथा केवल अतीत की कहानी नहीं है; यह भक्ति, सेवा, संकल्प और आध्यात्मिक प्रचार की एक प्रेरणादायक यात्रा के रूप में पढ़ी जाती है।
Reviewed by Rakesh Tiwari
on
सितंबर 25, 2026
Rating:


कोई टिप्पणी नहीं:
If you have any doubt please let me know.