श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 1 श्लोक 21 से 25: संस्कृत श्लोक, हिंदी अर्थ और तात्पर्य
प्रस्तावना
श्रीमद्भगवद्गीता हिंदू धर्म का एक महान आध्यात्मिक ग्रंथ है। इसमें भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को जीवन, धर्म, कर्म, आत्मा और भक्ति का दिव्य ज्ञान दिया है। भगवद्गीता के प्रथम अध्याय का नाम अर्जुनविषादयोग है।
अध्याय 1 के श्लोक 21 से 25 में अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण से अपना रथ दोनों सेनाओं के बीच खड़ा करने का अनुरोध करते हैं। वे यह देखना चाहते हैं कि युद्धभूमि में उनके विरुद्ध कौन-कौन से योद्धा खड़े हैं। भगवान श्रीकृष्ण उनके अनुरोध को स्वीकार करते हैं और उन्हें कुरुवंशियों को देखने के लिए कहते हैं।
आइए, इन श्लोकों का संस्कृत पाठ, हिंदी अर्थ और तात्पर्य विस्तार से समझते हैं।
श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 1 श्लोक 21
संस्कृत श्लोक
अर्जुन उवाच।
सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत॥ 21॥
हिंदी अर्थ
अर्जुन ने कहा, हे अच्युत! कृपया मेरा रथ दोनों सेनाओं के बीच में खड़ा कर दीजिए।
भावार्थ
अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण से अनुरोध करते हैं कि वे उनके रथ को कौरवों और पांडवों की सेनाओं के बीच ले जाकर खड़ा कर दें। अर्जुन युद्ध आरंभ होने से पहले यह देखना चाहते हैं कि उनके सामने कौन-कौन से योद्धा उपस्थित हैं।
इस श्लोक में अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण को ‘अच्युत’ कहकर संबोधित करते हैं। अच्युत का अर्थ है वह जो कभी अपने वास्तविक स्वरूप से विचलित नहीं होता।
तात्पर्य
भगवान श्रीकृष्ण परमेश्वर हैं, फिर भी वे अपने प्रिय भक्त अर्जुन के सारथी बने हैं। यह भगवान और उनके भक्त के बीच प्रेमपूर्ण संबंध को दर्शाता है।
अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण पर विश्वास करते हैं और उनसे सहायता माँगते हैं। इसी प्रकार, मनुष्य को भी कठिन परिस्थितियों में भगवान का स्मरण करना चाहिए और उनकी शिक्षाओं के अनुसार अपने कर्तव्य को समझने का प्रयास करना चाहिए।
जीवन की सीख: किसी भी कठिन परिस्थिति में जल्दबाजी में निर्णय लेने के बजाय पहले परिस्थिति को समझना चाहिए और भगवान का मार्गदर्शन प्राप्त करने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।
श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 1 श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
यावदेतान्निरीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान्।
कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन् रणसमुद्यमे॥ 22॥
हिंदी अर्थ
जब तक मैं युद्ध करने की इच्छा से यहाँ खड़े हुए इन योद्धाओं को अच्छी तरह देख न लूँ और यह न जान लूँ कि इस युद्ध में मुझे किन-किन लोगों के साथ युद्ध करना होगा, तब तक मेरा रथ दोनों सेनाओं के बीच खड़ा रखिए।
भावार्थ
अर्जुन युद्धभूमि में उपस्थित योद्धाओं को ध्यानपूर्वक देखना चाहते हैं। वे जानना चाहते हैं कि कौरवों की ओर से कौन-कौन युद्ध करने आया है और किन लोगों का उन्हें सामना करना पड़ेगा।
अर्जुन एक महान धनुर्धर और अनुभवी योद्धा हैं। फिर भी वे युद्ध आरंभ होने से पहले अपने सामने उपस्थित योद्धाओं को पहचानना चाहते हैं।
तात्पर्य
यह श्लोक आगे आने वाली अर्जुन की मानसिक स्थिति की भूमिका तैयार करता है। जब अर्जुन अपने सामने गुरुजनों, संबंधियों और मित्रों को देखेंगे, तब उनके मन में करुणा और मोह उत्पन्न होगा।
भगवद्गीता हमें सिखाती है कि जीवन में केवल भावनाओं के आधार पर निर्णय लेना पर्याप्त नहीं है। मनुष्य को अपने वास्तविक कर्तव्य और धर्म के अनुसार उचित कार्य को समझना चाहिए।
जीवन की सीख: किसी भी महत्वपूर्ण निर्णय से पहले परिस्थिति को अच्छी तरह समझें और विवेक के साथ अपने कर्तव्य का पालन करें।
श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 1 श्लोक 23
संस्कृत श्लोक
योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः।
धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः॥ 23॥
हिंदी अर्थ
मैं उन लोगों को देखना चाहता हूँ, जो यहाँ युद्ध करने के लिए एकत्र हुए हैं और जो दुर्बुद्धि धृतराष्ट्र-पुत्र दुर्योधन को प्रसन्न करने की इच्छा से इस युद्ध में उसका साथ देने आए हैं।
भावार्थ
अर्जुन उन योद्धाओं को देखना चाहते हैं जो दुर्योधन का समर्थन करने के लिए युद्धभूमि में उपस्थित हुए हैं। अर्जुन जानते हैं कि कौरवों और पांडवों के बीच लंबे समय से राज्य और न्याय को लेकर विवाद चल रहा है।
इस श्लोक में अर्जुन दुर्योधन के प्रति अपनी धारणा व्यक्त करते हैं। वे यह जानना चाहते हैं कि कौन-कौन लोग दुर्योधन का साथ देने के लिए युद्ध करने आए हैं।
तात्पर्य
इस श्लोक से हमें यह शिक्षा मिलती है कि किसी व्यक्ति का साथ देने से पहले उसके उद्देश्य और कार्यों पर विचार करना चाहिए। केवल मित्रता, स्वार्थ या किसी को प्रसन्न करने के लिए उसका समर्थन करना उचित नहीं होता, यदि उसके कार्य अन्यायपूर्ण हों।
भगवान श्रीकृष्ण की शिक्षाएँ मनुष्य को सत्य, धर्म और विवेक के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती हैं।
जीवन की सीख: जीवन में सही और गलत का निर्णय केवल व्यक्तिगत संबंधों या लाभ के आधार पर नहीं करना चाहिए। सत्य और धर्म को प्राथमिकता देनी चाहिए।
श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 1 श्लोक 24
संस्कृत श्लोक
सञ्जय उवाच।
एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत।
सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम्॥ 24॥
हिंदी अर्थ
संजय ने कहा, हे भरतवंशी धृतराष्ट्र! गुडाकेश अर्जुन द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर भगवान हृषीकेश ने उस उत्तम रथ को दोनों सेनाओं के बीच में खड़ा कर दिया।
भावार्थ
अर्जुन के अनुरोध को स्वीकार करते हुए भगवान श्रीकृष्ण अपने रथ को दोनों सेनाओं के बीच ले जाकर खड़ा कर देते हैं। संजय धृतराष्ट्र को युद्धभूमि में घट रही घटनाओं का वर्णन सुना रहे हैं।
इस श्लोक में अर्जुन को ‘गुडाकेश’ कहा गया है, जिसका अर्थ है निद्रा पर विजय पाने वाला। भगवान श्रीकृष्ण को ‘हृषीकेश’ कहा गया है, जिसका अर्थ है समस्त इंद्रियों के स्वामी।
तात्पर्य
भगवान श्रीकृष्ण अपने भक्त अर्जुन की इच्छा के अनुसार रथ चलाते हैं। इससे भगवान की भक्तवत्सलता और अपने भक्तों के प्रति उनके प्रेम का पता चलता है।
भगवान केवल अर्जुन के सारथी ही नहीं हैं, बल्कि आगे चलकर उनके आध्यात्मिक गुरु भी बनते हैं। जब अर्जुन अपने कर्तव्य को लेकर भ्रमित होते हैं, तब भगवान उन्हें आत्मा, कर्म, धर्म और भक्ति का ज्ञान प्रदान करते हैं।
जीवन की सीख: मन और इंद्रियों को मनमाने ढंग से चलाने के बजाय आध्यात्मिक ज्ञान के अनुसार उनका उपयोग करना चाहिए। कठिन समय में भगवान की शिक्षाओं का आश्रय लेना चाहिए।
श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 1 श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम्।
उवाच पार्थ पश्यैतान्समवेतान्कुरूनिति॥ 25॥
हिंदी अर्थ
भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य और अन्य सभी राजाओं के सामने रथ खड़ा करके भगवान श्रीकृष्ण ने कहा, हे पार्थ! यहाँ एकत्र हुए इन कुरुवंशियों को देखो।
भावार्थ
भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन का रथ ऐसी जगह खड़ा किया, जहाँ से वे भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य और अन्य प्रमुख योद्धाओं को देख सकते थे। इसके बाद भगवान ने अर्जुन से कहा कि वे वहाँ उपस्थित कुरुवंशियों को देखें।
भीष्म पितामह अर्जुन के पूजनीय पितामह थे और द्रोणाचार्य उनके गुरु थे। अर्जुन के लिए ये केवल विरोधी पक्ष के योद्धा नहीं थे, बल्कि उनके जीवन से गहराई से जुड़े हुए सम्माननीय व्यक्ति भी थे।
जब अर्जुन अपने सामने अपने गुरुजनों और संबंधियों को देखते हैं, तो उनके मन में करुणा और मोह उत्पन्न होने लगता है। यही स्थिति आगे चलकर उनके मानसिक संघर्ष का कारण बनती है।
तात्पर्य
यह श्लोक भगवद्गीता के आगे आने वाले महत्वपूर्ण उपदेश की भूमिका तैयार करता है। अर्जुन अपने संबंधियों को देखकर भावनात्मक रूप से विचलित होने लगते हैं। वे अपने पारिवारिक संबंधों और क्षत्रिय धर्म के बीच उलझ जाते हैं।
भगवान श्रीकृष्ण आगे अर्जुन को आत्मा की नित्यता और शरीर की नश्वरता का ज्ञान देते हैं। वे अर्जुन को समझाते हैं कि मनुष्य को मोह से ऊपर उठकर अपने वास्तविक कर्तव्य को समझना चाहिए।
भगवद्गीता की शिक्षाएँ हमें बताती हैं कि भावनाएँ महत्वपूर्ण हैं, लेकिन कठिन परिस्थितियों में विवेक, आध्यात्मिक ज्ञान और धर्म के सिद्धांतों का सहारा लेना भी आवश्यक है।
जीवन की सीख: जब भावनाओं और कर्तव्य के बीच संघर्ष हो, तब शांत मन से विचार करना चाहिए और धर्म के अनुसार उचित निर्णय लेना चाहिए।
अध्याय 1 श्लोक 21 से 25 का सारांश
भगवद्गीता के इन पाँच श्लोकों में अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण से अपना रथ दोनों सेनाओं के बीच खड़ा करने का अनुरोध करते हैं। भगवान उनके अनुरोध को स्वीकार करते हैं और उन्हें भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य तथा अन्य कुरुवंशियों को देखने के लिए कहते हैं।
इन श्लोकों से हमें तीन महत्वपूर्ण शिक्षाएँ मिलती हैं।
- भगवान पर विश्वास रखना चाहिए और कठिन समय में उनका स्मरण करना चाहिए।
- जीवन में निर्णय लेते समय भावनाओं के साथ-साथ विवेक और कर्तव्य का भी ध्यान रखना चाहिए।
- आध्यात्मिक ज्ञान मनुष्य को भ्रम और मोह से बाहर निकलने में सहायता करता है।
निष्कर्ष
श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 1 के श्लोक 21 से 25 हमें बताते हैं कि जीवन में कठिन परिस्थितियों का सामना करते समय मनुष्य के मन में अनेक प्रकार के विचार और भावनाएँ उत्पन्न हो सकती हैं। अर्जुन जैसे महान योद्धा भी अपने गुरुजनों और संबंधियों को देखकर मानसिक द्वंद्व में पड़ जाते हैं।
आगे भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को दिव्य ज्ञान प्रदान करते हैं और उन्हें अपने कर्तव्य को समझने का मार्ग दिखाते हैं। इस प्रकार भगवद्गीता हमें सिखाती है कि जीवन की समस्याओं में केवल मन की भावनाओं के आधार पर निर्णय नहीं लेना चाहिए, बल्कि भगवान की शिक्षाओं, आध्यात्मिक ज्ञान और धर्म के सिद्धांतों को समझकर आगे बढ़ना चाहिए।
हरे कृष्ण! 🙏
जय श्रीकृष्ण।
Reviewed by Rakesh Tiwari
on
अक्टूबर 25, 2026
Rating:


कोई टिप्पणी नहीं:
If you have any doubt please let me know.